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दिल खोल कर यारों हंसना है।
है अन्त कहां संघर्षों का? 
सुख दुख तो आख़िर वर्षों का।
हर गम पर शिकंजा कसना है।
दिल खोल कर यारों हंसना है।
 
क्यों? जीना है भयभीत हुए,
क्या हार हुई, क्या जीत हुए।
ये सब तो रब की रचना है,
दिल खोल कर यारों हंसना है।
 
क्यों? मन में हम संताप लिए,
क्यों? किसी से कोई आश लिए,
क्यों? खुद को, खुद से डसना है,
दिल खोल के यारों हंसना है।
 
खुद पर खुद का विश्वास रखो,
न मन को कभी निराश रखो,
क्यों? मोह जाल में फंसना है,
दिल खोल के यारों हंसना है।
         स इल्ज़ाम लगते हैं, 

बस इल्ज़ाम लगते हैं, 

क्यों हूँ बदला मैं, नहीं समझता कोई।  
बस हंसी दिखती है, 
घाव गहरे हैं कितने, नहीं समझता कोई।  

गिला गैरों से भला करें तो करें कैसे,
जब अपने ही मुझे अपनों में, नहीं  गिनता कोई।  

महफ़िलों में तो मैं हँसता हुआ नज़र आया.. 
पर कितना बिखरा हूँ, नहीं समझता कोई।  

बस इल्ज़ाम लगते हैं, 
क्यों हूँ बदला मैं, नहीं समझता कोई। 

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