बस इल्ज़ाम लगते हैं, क्यों हूँ बदला मैं, नहीं समझता कोई। बस हंसी दिखती है, घाव गहरे हैं कितने, नहीं समझता कोई।
बस इल्ज़ाम लगते हैं,
क्यों हूँ बदला मैं, नहीं समझता कोई। बस हंसी दिखती है, घाव गहरे हैं कितने, नहीं समझता कोई।
गिला गैरों से भला करें तो करें कैसे,जब अपने ही मुझे अपनों में, नहीं गिनता कोई।
महफ़िलों में तो मैं हँसता हुआ नज़र आया.. पर कितना बिखरा हूँ, नहीं समझता कोई।
बस इल्ज़ाम लगते हैं, क्यों हूँ बदला मैं, नहीं समझता कोई।